24 Feb 2026, Tue

26 जनवरी 1950 : किस पल भारत सच में गणतंत्र बना ?

26 जनवरी 1950 की सुबह भारत के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ लेकर आई. आज़ादी के करीब ढाई साल बाद देश ने खुद को पूरी तरह जनता का शासन घोषित किया. सुबह ठीक 10 बजकर 18 मिनट पर भारत गणतंत्र बना और कुछ ही पलों में सदियों की औपनिवेशिक विरासत पीछे छूट गई.

26 जनवरी 1950 की सुबह भारत के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ लेकर आई. आज़ादी के करीब ढाई साल बाद देश ने खुद को पूरी तरह जनता का शासन घोषित किया. सुबह ठीक 10 बजकर 18 मिनट पर भारत गणतंत्र बना और कुछ ही पलों में सदियों की औपनिवेशिक विरासत पीछे छूट गई. इसके छह मिनट बाद, 10 बजकर 24 मिनट पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली. उन्हें यह शपथ सुप्रीम कोर्ट के पहले मुख्य न्यायाधीश हीरालाल जे. कनिया ने दिलाई. शपथ ग्रहण के बाद डॉ. प्रसाद ने हिंदी और अंग्रेजी में देश को संबोधित किया, जिससे साफ हो गया कि यह नया भारत अपनी विविधता को साथ लेकर आगे बढ़ेगा.

उस दिन गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 को औपचारिक रूप से विदा कर दिया गया और भारत का अपना संविधान लागू हुआ. संविधान भले ही 26 नवंबर 1949 को बनकर तैयार हो चुका था, लेकिन इसे लागू करने के लिए 26 जनवरी की तारीख जानबूझकर चुनी गई. दरअसल, 26 जनवरी 1930 को कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की घोषणा की थी. बीस साल बाद उसी तारीख को संविधान लागू कर उस ऐतिहासिक संकल्प को स्थायी रूप दे दिया गया.
भारत का संविधान अचानक नहीं बना. आज़ादी से पहले ही यह तय था कि देश अपने नियम खुद बनाएगा. 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा का गठन हुआ और लगभग तीन साल तक चली लंबी बैठकों, बहसों और चर्चाओं के बाद संविधान तैयार हुआ. इसी दौरान 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद ने इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट पास किया, जिसके तहत भारत और पाकिस्तान दो अलग राष्ट्र बने. 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और इसके कुछ ही वर्षों बाद उसने अपना लोकतांत्रिक ढांचा पूरी तरह लागू कर दिया.

पहली परेड शाम के समय निकली थी

आज गणतंत्र दिवस की परेड सुबह होती है, लेकिन पहली परेड शाम के समय निकली थी. 26 जनवरी 1950 को दोपहर 2 बजकर 30 मिनट पर राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति भवन से बग्घी में सवार होकर निकले. छह ऑस्ट्रेलियाई घोड़ों द्वारा खींची जा रही उस बग्घी ने कनॉट प्लेस होते हुए नेशनल स्टेडियम तक का सफर तय किया, जिसे तब इरविन स्टेडियम कहा जाता था. शाम करीब 3 बजकर 45 मिनट पर वहां पहुंचने पर राष्ट्रपति को 31 तोपों की सलामी दी गई.

पहली परेड खास इसलिए भी थी क्योंकि उसमें आम जनता को सीधे तौर पर शामिल किया गया. करीब तीन हजार सैनिक और लगभग सौ विमान इस आयोजन का हिस्सा बने. यहीं से गणतंत्र दिवस को सेना और नागरिकों का साझा उत्सव बनाने की परंपरा शुरू हुई. इसी दिन विदेशी मुख्य अतिथियों को आमंत्रित करने की शुरुआत भी हुई. 1950 में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति डॉ. सुकर्णो पहले मुख्य अतिथि बने, जिसके बाद यह परंपरा हर साल निभाई जाने लगी.

1955 में पहली बार राजपथ पर परेड हुई

शुरुआती वर्षों में परेड के लिए कोई स्थायी स्थान तय नहीं था. कभी इरविन स्टेडियम, कभी लाल किला और कभी रामलीला मैदान इस आयोजन के गवाह बने. आखिरकार 1955 में फैसला हुआ कि परेड राजपथ से होकर निकलेगी और लाल किले तक जाएगी. उसी साल पहली बार राजपथ पर परेड हुई और पाकिस्तान के गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद मुख्य अतिथि बने, जो उस दौर की राजनीति के लिहाज़ से खास माना गया.

समय के साथ परेड का स्वरूप और भव्य होता गया. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2001 में परेड पर करीब 145 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जबकि 2014 तक यह खर्च बढ़कर 546 करोड़ रुपये हो गया. यह बढ़ता खर्च दरअसल आयोजन के फैलते पैमाने और बदलते स्वरूप को दर्शाता है. गणतंत्र दिवस केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उस विश्वास का उत्सव है कि इस देश की असली ताकत उसके लोग हैं. 1950 की उस सुबह से लेकर आज तक 26 जनवरी हमें याद दिलाती है कि आज़ादी का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि अपने कानून, अपने मूल्य और अपनी लोकतांत्रिक आत्मा पर गर्व करना है.

By manthantoday

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