मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना
ख़ून से मेरी पेशानियों पर हिंदुस्तान लिख देना

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सेराज अनवर

पटना:मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना
ख़ून से मेरी पेशानियों पर हिंदुस्तान लिख देना.ज़िंदादिल शायर इंदौर की शान और हिंदुस्तान की जान राहत इंदौरी नहीं रहे.
वह कोरोना वायरस से संक्रमित थे. कोविड-19 की पुष्टि होने के बाद 70 वर्षीय राहत इंदौरी को देर रात अस्पताल में भर्ती कराया गया था. जहां आज उन्होंने अंतिम सांस ली.


उन्होंने आज ही सुबह अपने फेसबुक वाल पर लिखा था .कोविड के शरुआती लक्षण दिखाई देने पर कल मेरा कोरोना टेस्ट किया गया, जिसकी रिपोर्ट पॉज़िटिव आयी है.ऑरबिंदो हॉस्पिटल में एडमिट हूँ.दुआ कीजिये जल्द से जल्द इस बीमारी को हरा दूँ.
एक और इल्तेजा है, मुझे या घर के दूसरे लोगों को फ़ोन ना करें, मेरी ख़ैरियत ट्विटर और फेसबुक पर आपको मिलती रहेगी और शाम में दुनिया को अलविदा कह गये.

राहत साहब तो दुनिया को अलविदा कह गए लेकिन पीछे अदब की वो विरासत छोड़ गए हैं जो हमेशा नई पीढ़ी के लिए किसी खजाने से कम नहीं होगी.राहत इंदौरी की सबसे खास बात यह रही कि वह अवाम के ख़यालात को बयां करते रहे. उसपर ज़बान और लहज़ा ऐसा कि क्या इंदौर और क्या लखनऊ, क्या दिल्ली और क्या लाहौर, हर जगह के लोगों की बात उनकी शायरी में होती है. इसका एक उदाहरण तो बहुत पहले ही मिल गया था. साल 1986 में राहत साहब कराची में एक शेर पढ़ते हैं और लगातार पांच मिनट तक तालियों की गूंज हॉल में सुनाई देती है और फिर बाद में दिल्ली में भी वही शेर पढ़ते हैं और ठीक वैसा ही दृश्य यहां भी होता है.

तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

राहत इंदौरी को उनकी बेबाक़ी के लिए याद किया जायेगा.राहत साहब को पढ़ने लिखने का शौक़ बचपन से ही रहा. पहला मुशायरा देवास में पढ़ा था. राहत साहब पर हाल में डॉ दीपक रुहानी की किताब ‘मुझे सुनाते रहे लोग वाकया मेरा’ में एक दिलचस्प किस्से का ज़िक्र है. दरअसल राहत साहब जब नौंवी क्लास में थे तो उनके स्कूल नूतन हायर सेकेंड्री स्कूल एक मुशायरा होना था. राहत साहब की ड्यूटी शायरों की ख़िदमत करने की लगी. जांनिसार अख्तर वहां आए थे. राहत साहब उनसे ऑटोग्राफ लेने पहुंचे और कहा- ” मैं भी शेर पढ़ना चाहता हूं, इसके लिए क्या करना होगा’जांनिसार अख्तर साहाब बोले- पहले कम से कम पांच हजार शेर याद करो..राहत साहब बोले- इतने तो मुझे अभी याद हैं.जांनिसार साहब ने कहा- तो फिर अगला शेर जो होगा वो तुम्हारा होगा..इसके बाद जांनिसार अख्तर ऑटोग्राफ देते हुए अपने शेर का पहला मिसरा लिखा- ‘हमसे भागा न करो दूर गज़ालों की तरह’, राहत साहब के मुंह से दूसरा मिसरा बेसाख्ता निकला- ‘हमने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह..’

राहत इंदौरी साहब ने बाबरी मस्जिद ढहाए जाने को लेकर एक शेर कहा था. उन्होंने कहा था-

टूट रही है हर दिन मुझमें इक मस्जिद
इस बस्ती में रोज दिसबंर आता है

ऐसा ही एक शेर उनका और भी है

अब के जो फैसला होगा वह यहीं पे होगा
हमसे अब दूसरी हिजरत नहीं होने वाली

राहत इंदौरी हिंदू या मुसलमानों के शायर नहीं थे.वह एक राष्ट्रीय शायर थे.जो आवाम की धड़कन में बसे थे.ऐसे शायर मरते नहीं बल्कि मेरे आपके घरों में सांस लेती हुई मालूम पड़ती है.दिलों में बसते हें.

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