अनाज माफिया के शिकंजे में जनवितरण प्रणाली, अरबों का हो रहा वारा-न्यारा

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*सरकार के महती अभियान ‘कोई पेट भूखा नहीं रहेगा’ को लग रहा धक्का
नवादा(डॉ बुद्धसेन)कोविड-19 को लेकर लाॅकडाउन ने पूरे देश को लाॅक कर दिया। चारों तरफ हाहाकार मच गया। रोज कमाने-खाने वालों, आर्थिक रूप से कमजोर निम्न मध्यम वर्ग के लोगों की स्थिति भयावह हो गयी। उनके सामने पेट भरने की बड़ी चुनौती आ गयी। सरकार ने भुखमरी से निपटने के लिए सभी जरूरतमंदों को खाद्यान्न मुहैया कराने का फैसला किया। राशन-कार्डधारियों को मुफ्त अनाज मुहैया कराने की कवायद शुरू की। फैसले को धरातल पर उतारने की पहल की गयी। अकेले नवादा जिले में इस योजना के तहत दो लाख 46 हजार किलोग्राम खाद्यान्न सिर्फ एक महीने में उपलब्ध कराये गये। इनमें 90 लाख किलोग्राम महीने के और 90 लाख किलोग्राम चावल अतिरिक्त बांटने के लिए दिये गये। इसके अलावा 66 लाख किलोग्राम गेहूं वितरण के लिए नवादा जिले को आवंटित किये गये।

कालाबाज़ारी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

वितरण की जिम्मेदारी जनवितरण प्रणाली के दुकानों को सौंपी गयी। लेकिन, लाल फीताशाही और माफिया की वजह से नवादा जिले में जनवितरण प्रणाली खानापूर्ति मात्र बनकर रह गयी है। सरकार द्वारा मुहैया कराये गये खाद्यान्न इनकी भेंट चढ़ रहे हैं।
जिला मुख्यालय नवादा से सटे गोनावां ग्रामपंचायत के मोतीबिघा, भदौनी पंचायत के खरीदीबिघा सहित जिले के लगभग सभी प्रखंडों से शिकायतें आयी कि जनवितरण प्रणाली के दुकानदारों ने सरकार द्वारा मुफ्त उपलब्ध कराये जानेवाले खाद्यान्न या तो उपभोक्ताओं को दिये ही नहीं गये या फिर जिन्हें मिला भी तो निर्धारित मात्रा से कम। सरकार बार-बार चावल, गेहूं और दाल देने की बात करती रही लेकिन, किसी को दाल नसीब नहीं हुआ। पहली बार अप्रैल महीने की तीन तारीख को सरकारी स्तर पर घोषणा की गयी कि सभी जिलों को दाल की आपूर्ति कर दी गयी है। दूसरी बार 15 अप्रैल के बाद पुनःः इसी उक्ति को दोहराया गया। बीस दिनों बाद मई महीने की सात तारीख को कहा गया कि राज्य के सभी जिलों को दाल की आपूर्ति कर दी गयी है। सरकार की घोषणा के एक महीना और लाॅकडाउन के डेढ़ महीने बाद भी जरूरतमंदों की थाल में दाल नहीं पहुंचा है।

ग़रीबों के हाथ में ख़ाली कटोरा

नाम का खुलासा नहीं करने की शर्त पर जनवितरण प्रणाली के एक दुकानदार ने बताया कि सारा खेल माफिया और अधिकारियों की सांठ-गांठ से होता है। प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी खाद्यान्न मुहैया कराने के एवज में प्रतिक्विंटल एक सौ रुपये की वसूली करते हैं। जो दुकानदार देने से इनकार करते हैं, उनसे न केवल गाली-गलौज की जाती है बल्कि बहाना बना दुकान की अनुज्ञप्ति(लाइसेंस) भी रद्द कर दी जाती है। दुकानदारों का आरोप है कि ‘शुभ-लाभ’ के चक्कर में अधिकारियों द्वारा उपभोक्ताओं तक सही जानकारी नहीं पहुंचायी गयी। नतीजा यह हुआ कि उपभोक्ताओं ने गलतफहमी का शिकार हो दुकानदारों को काफी जलील किया। धरना-प्रदर्शन तक किये गये। बावजूद इसके उनके कानों पर जूं नहीं रेंगा।
ककोलत विकास परिषद के अध्यक्ष व समाजसेवी सैयद मसीह उद्दीन ने इसी भ्रष्टाचार को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिखा था। पत्र में नवादा जिले में जनवितरण प्रणाली में माफिया और अधिकारियों के हावी होने का जिक्र किया गया था। कहा गया कि लाॅकडाउन से आपूर्ति प्रभावित होने के कारण काफी भयावह स्थिति है। यदि जन वितरण के अनाज पर प्रभावी अंकुश लगा दिया जाये तो लोगों को भुखमरी से बचाया जा सकता है। शिकायत को मुख्यमंत्री ने गंभीरता से लिया और नवादा के जिलाधिकारी को कार्रवाई का निर्देश दिया। जिलाधिकारी के आदेश पर जिले भर में छापामारी अभियान चलाया गया और कई दुकानदारों के लाइसेंस रद्द कर दिये गये। इस अभियान में कई ऐसे दुकानदारों को बलि का बकरा बनना पड़ा जो नियमित रूप से अनाज का वितरण कर रहे थे। आरोप उछल रहे हैं कि सम्बंधित अधिकारियों ने इसमें भी ‘शुभ-लाभ’ का फार्मूला निकाल लिया और एकपक्षीय कार्रवाई कर खानापूर्ति भर की गयी। जनवितरण दुकानदारों का आरोप है उनके माध्यम से जो अतिरिक्त खाद्यान्नों का वितरण करवाया गया उसके कमीशन का भुगतान नहीं किया गया। यही नहीं, सरकार के निर्देश के बावजूद जनवितरण दुकानदारों को सेनिटाइजर, मास्क और ग्लैप्स उन्हें मुहैया नहीं कराया गया जिससे संक्रमण रोकने के अभियान को धक्का पहुंच सकता है।

जनवितरण प्रणाली की दुकान


नवादा जिला में अनाज घोटाला का बड़ा रैकेट लम्बे समय से काम कर रहा है। अनाज की कालाबाजारी से प्रत्येक माह करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा किया जाता है। यह काम कथित रुप से अनाज माफिया सुसुम कुमार और प्रखंड व अनुमंडल स्तर के संबंधित पदाधिकारियों की सांठगांठ से यह संभव हो रहा है। सूत्र बताते हैं कि प्रति बोरा अनाज पर सभी संबधित पदाधिकारियों, डीलर तथा बिचैलियों का कमीशन बंधा हुआ है और इनके बीच मोटी रकम की बंदरबाट की जाती है। इस रैकेट की योजना के अनुसार संबधित डीलर या तो आवंटित अनाज का आधा हिस्सा बांटते हैं और आधे की कालाबाजारी करते हैं अथवा तीन माह के बदले एक माह ही बांटते हैं। शेष दो महीने के अनाज कालाबाजार में बेच दिये जाते हैं। यह सबकुछ योजनाबद्ध तरीके से पहले से तय रहता है और कालाबाजारी किये जानेवाले सारे अनाज गोदाम में पहुंचते ही नहीं हैं। जनवितरण प्रणाली के दुकानदारों द्वारा खाली ट्रक को गोदाम तक पहुंचाकर तकनीकी प्रक्रिया पूरी कर ली जाती है। अब तो पौश मशीन में भी कारीगरी करके अनाज का फर्जी वितरण दिखा दिया जाता है।
बहरहाल, कोविड-19 को लेकर उत्पन्न खाद्यान्न की समस्या को दूर करने के लिए राज्य सरकार ने जीविका के माध्यम से उनलोगों के राशन कार्ड बनाने का निर्देश दिया जो वास्तव में इसके हकदार हैं लेकिन, किसी कारणवश उनके नाम राशन कार्ड नहीं बन सका। लेकिन, सरकार के आदेश का सही संदेश नहीं पहुंचने के कारण कई जगहों पर जीविका दीदियों ने सिर्फ उन्हीं के आवेदन राशन कार्ड बनाने के लिए लिये जो परिवार जीविका से जुड़ा है। उल्लेखनीय है कि जिले के कई क्षेत्रों में पात्र परिवारों के राशन कार्ड नहीं बने. कभी जीविका तो कभी प्रखंड और कभी अनुमंडल कार्यालय का चक्कर लगाते रहे। राज्य सरकार के निर्देश पर जिला प्रशासन ने वर्ष 2018 के अक्टूबर-नवम्बर महीने में आरटीपीएस काउंटर खोल नये राशन कार्ड के लिए लोगों से आवेदन जमा लिये। डेढ़ वर्ष से अधिक समय बीत गये लेकिन आवेदकों को अभीतक राशन कार्ड मुहैया नहीं कराया गया है। नतीजा यह है कि इस महासंकट में ऐसे लोगों को जनवितरण प्रणाली की दुकानों से अनाज नहीं मिल पा रहा है। कुछ दुकानदारों ने मानवता के नाते ऐसे जरूरतमंदों के बीच अनाज मुहैया कराने की कोशिश की तो उनपर भी अंकुश लगा दिया गया। मुखिया द्वारा संचालित सामूहिक भोजन का सही तरीके से क्रियान्वयन नहीं किया जा रहा है।

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